भगवन शिव का लिंग के रूप में अवतरण :-

पहले भगवन शिवा का कोई रूप नहीं था । ब्रह्माजी को सृष्टि का सर्जक और विष्णुजी को पालक kaha कहा गया है । एक बार दोनों में यह विवाद हुआ कि हम दोनों में श्रेष्ठ कौन है ? उनका यह विवाद जब बढ़ने लगा तो तभी वहां एक अद्भुत ज्योतिर्लिग प्रकट हुआ। उस ज्योतिर्लिग को वे समझ नहीं सके और उन्होंने उसके छोर का पता लगाने का प्रयास किया, परंतु सफल नहीं हो पाए। जब दोनों देवता निराश हो गए तब उस च्योतिर्लिंग ने अपना परिचय देते हुए कहां कि मैं शिव हूं। मैंने ही आप दोनों को उत्पन्न किया है। तब विष्णु तथा ब्रह्मा ने भगवान शिव की महत्ता को स्वीकार किया और उसी दिन से शिवलिंग की पूजा की जाने लगी, तभी से महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाने लगा ।
भगवन शिव का समुद्र मंथन में निकला हुआ विष पीना :-